वामपंथियों ने हमेशा श्रीराम के अस्तित्व को नकराने का काम किया

बरसों बाद अयोध्या में हलचल है। रामभक्तों की नजर सर्वोच्च न्यायालय और सरकार की ओर है। उन्हें उम्मीद है उनके आराध्य भगवान श्रीराम तंबू में अस्थायी मंदिर की बजाय जल्दी ही भव्य मंदिर में विराजेंगे। तथ्य स्पष्ट बता रहे हैं कि विवादित स्थल ही भगवान श्रीराम की जन्मभूमि है। जो लोग उन तथ्यों को नकारते हैं उनकी मंशा जगजाहिर है। इस आलेख में भगवान श्रीराम की ऐतिहासिकता प्रस्तुत की गई है। विभिन्न संदर्भ ग्रंथों से श्रीराम के संबंध में अनेक तथ्य समाहित किए गए हैं

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सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि के स्वामित्व संबंधी मामले की सुनवाई जनवरी, 2019 तक स्थगित कर दी है। लगता है विवादास्पद ढांचे के ढहने की वर्षगांठ किसी खास हलचल के बिना बीत जाएगी। ढांचा इसलिए कि इसका परिचय इतिहास के अधिकांश पन्नोें में ‘मस्जिद’ नहीं, एक ढांचे के तौर पर दर्ज है। शीर्ष अदालत ने अनजाने में इस विवादास्पद मुद्दे को 2019 के आम चुनाव के और करीब लाकर खड़ा कर दिया, जिसने चार शताब्दी से हिंदुओं की कल्पना के एक कक्ष में आशा का दीप प्रज्ज्वलित कर रखा है। जहां राष्ट्र हिंदू सनातन परंपरा में भगवान राजा राम और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजनीय श्रीराम के प्रति आस्था के प्रतीक भव्य मंदिर के खिलाफ मद्धिम होते विरोध के पीछे काम कर रही भावना की विवेचना कर रहा है, वहीं अदालत में राम मंदिर के पक्ष में खड़े श्रद्धालुओं की ओर से प्रस्तुत साक्ष्योें की जांच हमारी जानकारी में वृद्धि कर सकती है, जिसके आधार पर सितंबर, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) ने हमारे दिल को सुकून देने वाला फैसला सुनाया था। यह हिंदुओं के आत्मविश्वास और सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, डी.वी. शर्मा और एस. यू. खान के फैसले ने वामपंथी अकादमिकों, खासकर प्रोफेसर रोमिला थापर, डी.एन झा, शिरिन मूसवी, इरफान हबीब, डी. मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन और सीताराम रॉय जैसे लोगों को हैरान कर दिया, जो ढांचे के पक्ष में पुरजोर दलील प्रस्तुत करते रहे थे। दरअसल, इतिहासकारों की मुखर आलोचना को नजरअंदाज करते हुए आम पाठकों के लिए यह देखना प्रासंगिक होगा कि वामपंथी शिक्षाविद् उच्च न्यायालय के सामने अपने दावों की पुष्टि करने में बुरी तरह विफल रहे। यदि सेकुलर मीडिया लखनऊ में सार्वजनिक सुनवाई की नियमित या निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता तो फैसले को सुनकर किसी को हैरानी या आश्चर्य नहीं होता।
वामपंथियों ने 1989 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्वानों के नेतृत्व में राम जन्मभूमि के खिलाफ अभियान शुरू किया था। देखते ही देखते इसे देशभर में फैला दिया गया। इसका मुख्य कथानक ‘ऐतिहासिक साक्ष्य’ के नाम पर राम के अस्तित्व को नकारना था। वामपंथियों के अनुसार, ‘‘अयोध्या एक पौराणिक शहर था। वर्तमान समय की अयोध्या नगरी मूल रूप से साकेत नाम का नगर था, जो वास्तव में बौद्ध मतावलंबियों का गढ़ था। राम की पूजा 18वीं-19वीं शताब्दी की घटना, बाबरी ढांचा खाली भूमि पर बनाया गया था और अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम के बीच विभाजन की लकीर को जन्म दिया था औपनिवेशिक काल के अंग्रेजों ने।’’
रामायण के विद्वानों का मानना है कि पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से रामकथा जन-जन में प्राचीन आख्यानों के माध्यम से मौखिक रूप से बांची जाती रही है। हालांकि हरमन जैकोबी रामकथा के कालखंड को और पहले, करीब आठवीं या छठी शताब्दी ईसा पूर्व मानते हैं जब यह जनमानस के बीच प्रचलित थी। रामकथा के लिखित संस्करण शायद उसके एक या दो शताब्दी बाद अस्तित्व में आए जब महर्षि वाल्मीकि ने चौथी या तीसरी शताब्दी ई.पू. रामायण की रचना की। चौथी-पांचवीं शताब्दी तक राम की पूजा भारत के कोने-कोने में हो रही थी। इसके साहित्यिक, मूर्तिकला आधारित और पुरालेखीय प्रमाण मौजूद हैं।
चौथी-पांचवीं ई. में गुप्त साम्राज्य के दरबार के साहित्य शिरोमणि कालिदास (रामायण पर वाल्मीकि के बाद सबसे महान कवि) ने अपनी कृति ‘रघुवंशम्’ में राम का वर्णन ‘राम भी धनो हरि’ के रूप में किया है। चंद्रगुप्त द्वितीय की कन्या और वाकाटक की रानी प्रभावती रामभक्त थीं। चौथी शताब्दी के अंतिम दशकों में जारी दो शिलालेखों से पता चलता है कि रामगिरी पहाड़ी (आधुनिक रामटेक) के शीर्ष पर भगवान राम के लिए एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ, जिसमें उनके चरण-पद की स्थापना की गई थी। कालिदास ने गुप्त वंश के राजा के आदेश पर वाकाटक राज्य की यात्रा की थी और ‘मेघदूत’ में रामगिरी का उल्लेख किया था। माना जाता है कि प्रभावती के पुत्र प्रवरसेन द्वितीय ने ‘सेतुबंद’ लिखी जिसमें राम को विष्णु का अवतार ही नहीं, बल्कि उनके समान माना गया है। प्रवरसेन ने 431 और 439 ई. के दौरान अपनी नई राजधानी प्रवरपुरा (संभवत: आधुनिक पौनार, वर्धा) में बनाई और वहां राम के लिए एक मंदिर का निर्माण किया।
इस अवधि (पांचवीं शताब्दी का मध्यकाल) के आसपास पवनार में पाई गर्इं मूर्तियां राम का प्रतिरूप मानी जाती हैं और इन्हें राम संबंधी सबसे प्राचीन पुरातात्विक साक्ष्य माना गया है। झांसी के देवगढ़ के मंदिर में रामायण की झांकी बाद के कालखंड में गढ़ी गई होगी। ध्यानन देने वाली बात यह है कि एक तरफ जहां पत्थरों में रामगाथा उकेरी जा रही थी, वहीं समकालीन साहित्य भी रामकथा के रस में सराबोर हो रहा था।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम संस्कृत और प्राकृत साहित्य का अमूल्य अंग बन चुके थे। राम को रामोपाख्यान (महाभारत में वर्णित रामकथा), विष्णु और ब्रह्म पुराण और भास के ‘प्रतिमा’ और ‘अभिषेक’ नाटकों में मुख्य चरित्र के तौर पर प्रस्तुत किया गया। राम केंद्रित प्राकृत पुस्तकों में संघदास की ‘वसुदेवहिष्टि’, जैन संत विमल सूरी की ‘पउम चरिउ’ (चौथी शताब्दी) और भट्ट की ‘रावण वध’ (छठी शताब्दी) उल्लेखनीय हंै। ये सारे प्रमाण दर्शाते हैं कि श्रीराम ने पांचवीं शताब्दी तक विष्णु-अवतार के रूप में एक विशेष स्थान प्राप्त कर लिया था।
मुस्लिमों का आक्रमण शुरू होने तक रामायण जनमानस के ह्दय में बस चुकी थी। मुस्लिम आक्रमणकारियों से लोहा लेने वाले दो महत्वपूर्ण गुर्जर राजाओं को राम के अनुज लक्ष्मण का वंशज माना जाता है। मंडोर राजवंश की उत्पत्ति का वर्णन करने वाले जोधपुर बोका के शिलालेखों (837 सदी) के अनुसार राजवंश का नाम लक्ष्मण के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने अपने बड़े भाई राम के प्रतिहार (द्वारपाल) के रूप में सेवा करते हुए किसी भी अनजान व्यक्ति को प्रवेश करने से रोकने का कर्तव्य निभाया था। ग्वालियर प्रशस्ति अभिलेखों में भी गुर्जर प्रतिहार राजघराने को लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जिन्होंने राम के प्रतिहार के रूप में राम की ओर से दी गई प्रवेश निषेध की आज्ञा का पालन करने का कर्तव्य निभाया था।
राम पंथ विकास के अपने दूसरे चरण में तब पहुंचा जब राम को विष्णु के अवतार के रूप में चित्रित किया गया। इस दौर को दर्शाने वाली सबसे पुरानी मूर्तिकला खजुराहो (950-970 सदी) में पारस्वथ के जैन मंदिर में देखी जा सकती है, जिसकी बाहरी दीवारों पर राम की दो मूर्तियां स्थित हैं। पहली मूर्ति में राम ने तीर-धनुष धारण कर रखा है और दूसरी में उनके चार हाथ हैं जिनमें से ऊपरी दाएं और निचले बाएं हाथ में तीर है, उनका निचला दाहिना हाथ हनुमान को आशीर्वाद देने की मुद्रा में है और उसके ऊपर के बाएं हाथ से राम ने सीता को थाम रखा है।
जोधपुर (11वीं शताब्दी) के नजदीक ओसीन में अम्बा माता मंदिर की दीवार पर राम और सीता लक्ष्मी-नारायण के रूप में खड़े हैं। राम के हाथों में विष्णु के चार प्रतीक हैं। यह मूर्ति राम की है। इसका प्रमाण हनुमान की मूर्ति देती है जो उनकी दार्इं ओर खड़ी है। आठवीं शताब्दी तक दक्षिण के मंदिरों में मुख्य देवता के रूप में राम का प्रचलन शुरू होने लगा था। राम मंदिर का सबसे प्राचीन शिलालेख परातंक प्रथम (907-955) के शासनकाल के सातवें वर्ष का मिला है, जिसमें यह बात दर्ज है कि चेंगलपट जिले में स्थित कोडंदारामा मंदिर में विराजमान अयोध्या के भगवान को भूमि उपहार में दी गई थी।
उसके बाद देश के कई हिस्सों में राम मंदिरों का निर्माण शुरू हुआ और इसी सिलसिले में नए मंत्र, स्तोत्र और ध्यान-प्रार्थना के लिए साहित्य की आवश्यकता महसूस होने लगी। 11वीं सदी से कई ग्रंथों की रचना होने लगी। तीन सबसे पुराने ग्रंथ हैं- रामपर्व तापनीय उपनिषद, बुद्धकौशिक का रामरक्षास्तोत्र और 12वीं शताब्दी में लिखी गई अगस्त्य संहिता, जिसमें शिव रामभक्ति में डूबते हुए दिखाए गए हैं। यह मान्यता प्रचलित होने लगी कि राम सिर्फ विष्णु के अवतार नहीं, बल्कि सार्वभौम सत्य हैं। राम की लोकप्रियता मध्ययुगीन काल की राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान और बढ़ी। तेरहवीं शताब्दी में देवगिरी के यादव साम्राज्य के एक मंत्री हेमाद्री ने एक धर्म-निबंध (नियम संहिता) लिखा जिसमें राम को अवतार के रूप में पूजा करने की पूजन पद्धति बताई गई थी। उन्होंने राम के जन्म से जुड़े एक समारोह का वर्णन किया और अगस्त्य संहिता का एक भाग फिर से प्रस्तुत किया, जिसमें रामनवमी के महत्वपूर्ण त्योहार की चर्चा की गई है। 12वीं और 15वीं सदी के दौरान रामकथा कन्नड़, तेलुगू, मलयालम, गुजराती, बंगाली, उड़िया और मराठी में दोबारा रची गई।
मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन से तमिल क्षेत्र में ‘शक्तिपुंज पुरुषोत्तम : भगवान राम’ के नाम की जयकार शुरू हुई। जब बुद्धिजीवियों ने देखा कि आक्रमणकारी देशवासियों और अपने आत्मीय संगियों की संस्कृति को रौंद रहे हैं, तो उन्होंने धनुषधारी राम के स्वरूप में कोडंद-राम की अवधारणा का आह्वान किया। आदित्य चोल ने कोडंद-रामेश्वरम को समर्पित पवित्र मंदिर बनाया था, जो संभवत: सशस्त्रधारी राम की छवि का सबसे पहला चित्रण है, साथ ही ‘रामायण को राजनीति की बिसात पर प्रस्तुत’ करने का शुरुआती संकेत भी।
वास्तव में मध्ययुगीन काल में मुस्लिम सेनाओं के रास्ते में पड़ने वाले हिंदू राज्यों के शासक यह मान रहे थे कि उनका जन्म राम की तरह बुरी ताकतों को पराजित करने के लिए हुआ है। चालुक्य / सोलंकी राजा, गुजरात के जयसिम्हा सिद्धराज को रामचंद्र के अवतार के रूप में माना गया। उसी तरह अजमेर के पृथ्वीराज तृतीय ‘रामावतारस्यैव पृथ्वीराज्यस्य’ माने गए, जिन्होंने राक्षसों ‘नरक्सासम’ म्लेच्छोें का अंत करने की प्रतिज्ञा ली थी।
हिंदू शासकों ने मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा ढाए गए अत्याचार, विनाश और लूट-पाट से उत्तर भारत के पवित्र स्थानों को बचाने की प्रतिज्ञा ली। आज भी बड़ी संख्या में ऐसे स्थल मौजूद हैं, जिन्हें आक्रांताओं ने ध्वस्त कर दिया था, और हिंदू पवित्र अवसरों पर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। बाबर के मरने के करीब 80 साल बाद 1608 और 1611 के बीच भारत का दौरा करने वाले अंग्रेज यात्री विलियम फिंच ने राम जन्मभूमि के प्रति गहरी हिंदू आस्था का उल्लेख किया है। उन्होंने रामकोट के भग्नावशेषों के बीच ब्राह्मणों को पूजा-अर्चना करते और सरयू में विधि-विधान से स्नान करने वाले अपने यजमानों के नामों को अपनी बहियों में दर्ज करते देखा था। आॅस्ट्रिया जेसुइट, जोसेफ टिफेंथलर ने 1766 और 1771 के बीच अवध का दौरा किया और रामनवमी के अवसर पर बड़ी संख्या में हिंदुओं को मंदिर के अंदर स्थित वेदी (पालना) जैसी धार्मिक संरचना की पूजा करते देखा था।
एक और दिलचस्पत तथ्य यह है कि 26 फरवरी, 1944 को उत्तर प्रदेश गजट में प्रकाशित नवाबी और ब्रिटिश काल के दस्तावेजों और वक्फ की संपत्तियों की सूची दर्शाती है कि बाबर ने बाबरी ढांचे के रखरखाव के लिए किसी वक्फ बोर्ड का गठन नहीं किया था। संभवत: वह उस क्षेत्र में ज्यादा दिन नहीं ठहरा था, लेकिन यही तथ्य शिया और सुन्नी के बीच ढांचे के स्वामित्व के विवाद को जन्म देने का कारण बना। इस्लाम में मस्जिद बनाने के लिए भूमि पर मालिकाना हक होना अनिवार्य है चाहे वह शिया हो, सुन्नी हो या अहमदी।
इसके अलावा, हिंदू कानून और पवित्र ग्रंथों में इस बात पर जोर दिया गया है कि मंदिर की संपत्ति किसी भी स्थिति में गायब नहीं हो सकती। कात्यायन का कहना है कि मंदिर की संपत्ति कोई गायब नहीं कर सकता, भले ही सैकड़ों साल से अनजान लोगों ने वहां पूजा-अर्चना की हो। इसी आधार पर 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अदालतों ने भारत में हिंदू मूर्ति या देवता की मान्यता को विधिक स्वरूप माना था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस दलील को राम जानकी जी बनाम बिहार राज्य मामले में समर्थन देते हुए कहा था, ‘‘हिंदू कानून के तहत हिंदू देवता की मूर्ति को एक न्यायिक विषय के रूप में मान्यता देता है जिसे हिंदू शास्त्रों के अनुसार संपत्ति रखने का वैसा अधिकार दिया जाता है जैसा कि किसी सामान्य व्यक्ति को है। विधिक व्यक्ति के तौर पर किसी भी छवि को नहीं, बल्कि मन के विशिष्ट भाव से गढ़ी गई पवित्र मूरत को यह दर्जा दिया गया है”
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुस्लिम पक्षकारों के वकील ने स्वीकार किया कि हिंदू मूर्ति एक न्यायिक व्यक्ति है, लेकिन उस न्यायिक व्यक्ति के स्थान की अवधारणा पर आपत्ति जताई। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि स्थान की दिव्यता ने इसे स्वयंभू देवता बना दिया है, जो पूजनीय है। अगर एक स्थान को देवता के उपासकों द्वारा उस देवता को दिए गए नाम या धार्मिकता या अलौकिक घटनाओं से पहचाना जाता है तो उसे ‘देवता’ और ‘न्यायिक व्यक्ति’ के रूप में माना जा सकता है। हिंदू उस स्थान (श्रीराम जन्मभूमि,अयोध्या) को श्रीराम की जन्मस्थली के रूप में पूजा करते आए हैं।
श्रीराम जन्मभूमि के महंतों और बाबरी ढांचे के पक्षकारों के बीच 1858 से चल रहे मुकदमे में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में प्रस्तुत दस्तावेजों से पता चलता है कि वहां मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और 1934 के दंगों के बाद वहां कभी कोई नमाज नहीं अदा की गई। जाहिर है कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने इसलिए इस ढांचे पर कब्जे के लिए नहीं, बल्कि विवादित परिसर की स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है। बोर्ड ढांचे के मुख्य गुंबद के अंदर मूर्तियों की स्थापना (23 दिसंबर, 1949) की 12वीं सालगिरह से महज पांच दिन पहले 18 दिसंबर, 1961 को मुकदमे में शामिल हुआ था।
अधिकृत क्षेत्र में हिंदुओं को पूजा का अधिकार देने के बजाय उसे चुनौती देने के लिए बाद में उठाया गया कदम निश्चित रूप से एक राजनीतिक निर्णय होगा, हालांकि पृष्ठभूमि में सक्रिय किरदारों को हम नहीं जानते। सितंबर, 2010 से जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने दैनिक सुनवाई शुरू की तो बहुमत हिंदू समुदाय के पक्ष में बनने लगा। ऐसे में जन्मस्थान पर हिंदुओं के अधिकार को चुनौती देने वाले व्यक्तियों का हठी समूह स्पष्ट रूप से राजनीतिक और वैचारिक है। उनका क्रोध बढ़ने लगा है, क्योेंकि मुस्लिम समुदाय के अंदर भी मंदिर के पक्ष में आवाजें उठने लगी हैं। विरोध का झंडा लिए घूमते ऐसे लोगों के प्रति हमें सचेत रहना होगा, क्योंकि सत्ता के सभी केंद्रों में उनकी पहुंच है।

http://www.panchjanya.com/Encyc/2018/11/26/Leftists-always-did-the-job-of-refuting-Shriram-s-existence.html

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Ayodhya: Continuing the Saga of Sri Rama

The Supreme Court of India has done well to postpone hearings regarding the title suit in the Rama Temple case at Ayodhya to January 2019, thereby allowing the anniversary of the demolition of the controversial structure – a non-mosque for the better part of its recorded history – to lapse in peace. That this also brings this contentious issue that has excited the Hindu imagination for over four centuries, closer to the national elections of 2019, is perhaps an unintended outcome. As the nation ponders over the fast-dissipating resistance to the grand temple in honour of Sri Rama, God and King exemplar of Hindu tradition, it may be instructive to examine the evidences adduced by devotees fighting the case, to get the largely satisfactory judgment from the Allahabad High Court (Lucknow Bench) in September 2010. It marked a huge step forward in the journey of Hindu self-affirmation and empowerment.

There is little doubt that the judgement by Justices Sudhir Agrawal, D.V. Sharma and S.U. Khan shocked Left academic circles, most notably Professors Romila Thapar, D.N. Jha, Shireen Moosvi, Irfan Habib, D. Mandal, Supriya Verma, Jaya Menon and Sita Ram Roy, who had all been hyper-active in defence of the Masjid. Shrugging aside the loud denunciations of the ‘Masjid’ historians, what is pertinent to the general reader is the fact that the Left academics failed abysmally to establish their claims regarding the temple-mosque before the High Court. Had the secular media done regular or fair reportage of the public hearings in Lucknow, the verdict would not have come as a shock or surprise.

The Left campaign against the Ramjanmabhumi began in 1989 under the lead of scholars from the Jawaharlal Nehru University. It quickly became an all-India campaign, which mainly stated that Rama was not a historical figure, that Ayodhya was a mythical city, that present day Ayodhya was originally known as Saketa and was a Buddhist stronghold, that Rama worship was an eighteenth-nineteenth century phenomena, that the Babri Masjid was built on vacant land, and that the Hindu-Muslim divide at Ayodhya was created by the British in colonial times.

Historian Dr Meenakshi Jain has collated all literary, sculptural and epigraphic evidence to debunk these claims in her book, Rama & Ayodhya (Aryan Books International, 2013), which clinically analyses the Allahabad High Court judgment. This article is based on this research.

Ramayana scholars agree that ancient ballads (akhyanas) disseminated the Rama Katha orally as early as the fifth century B.C., though Hermann Jacobi has suggested that the story could go back further to the eighth or sixth century B.C. Written versions of the Rama Katha probably appeared a century or two thereafter, with Valmiki composing his Ramayana in the fourth or third century B.C. Certainly, there is adequate literary, sculptural and epigraphic evidence to show that by the fourth-fifth century A.D., the worship of Rama was an all-India phenomenon.

Kalidas, scholar at the Gupta court in the fourth-fifth century A.D., and ranked next only to Valmiki as a great Ramayana poet, described Rama as Ramabhidhano Hari, Hari who is known as Rama, in Raghuvamsa. Prabhavati Gupta, Vakataka queen and daughter of Chandra Gupta II, was a Rama devotee. The two inscriptions she issued in the last quarter of the fourth century A.D. suggest that a sanctuary dedicated to Rama was situated on top of Ramagiri hill (modern Ramtek), probably enshrining his footprints (pada). Kalidas visited the Vakataka kingdom at the behest of his Gupta king and mentioned Ramagiri in Meghaduta. Prabhavati’s son, Pravarasena II, is believed to have written Setubandha, where Rama was regarded as identical with Vishnu and not merely his incarnation. Pravarasena II built a temple dedicated to Rama in his new capital, Pravarapura (probably modern Paunar, Wardha), where he shifted sometime between A.D. 431 and 439.

Sculpted panels found at Paunar around this period (mid-fifth century), rank among the oldest pieces of archaeological evidence regarding the iconographic representation of Rama. The Ramayana panels at the temple at Deogarh, Jhansi, come a little later. It is to be noted that this presentation of the Rama story in stone occurred side by side its popularity in contemporary literature.

The hero-god became the subject of several works in Sanskrit and Prakrit. He figured in Ramopahkyana (Mahabharata version of the Rama story), in Vishnu and Brahmanda Puranas, and Bhasa’s Pratima and Abhisheka Natakas. Notable Prakrit texts include Sanghadasa’s Vasudevahindi; Jain monk Vimal Suri’s Paumacariya (fourth century A.D.); and Bhatti’s Ravanavadha (probably sixth century A.D.). All this evidence suggests that Sri Rama had acquired a special status as an avatara of Vishnu by the fifth century A.D.

By the time of the Muslim invasions, the Ramayana was deeply ingrained in the popular mind. Two important Gurjara ruling houses that led the fight against the invaders claimed descent from Rama’s younger brother, Lakshmana. The Jodhpur inscription of Bauka (A.D. 837), which gave the family history of the Mandor line, stated that the dynasty was named after Lakshmana, who served as a Pratihara (door keeper) to his elder brother, Rama, and was duty bound to stop all intruders. The Gwalior prasasti of the Gurjara Pratihara king, Bhoja, also traced the origins of the family to Lakshmana, who “who served as the door-keeper (of Rama), owing to (his) commandment not to allow others to enter (pratiharana-vidher=yah pratihara asit)”.

The growing Rama sampradaya reached its second stage of evolution when Rama began to be depicted as a form of Vishnu, in his own right. The oldest sculptural examples of this development can be seen in the Jain temple of Parsvanath at Khajuraho (A.D. 950-970), which shows two murtis of Rama on its outer walls. The first depicts Rama holding the bow and arrow, the second shows him with four arms, holding the arrow in his upper right and lower left hand, his lower right hand blessing Hanuman and his upper left holding Sita.

There is a standing image of Rama and Sita portrayed as Lakshmi-Narayana in a niche on the wall of the Amba Mata temple at Osian, near Jodhpur (eleventh century A.D.) Rama holds the four emblems of Vishnu. What identifies him as Rama is the figure of Hanuman standing to the right.

By the eighth century itself, the concept of Rama as chief deity of the temple had come into vogue in the south. The earliest inscriptional evidence of a Rama temple dates to the seventh year of the reign of Parantaka I (907-955) and records the gift of land to the Lord of Ayodhya of the Kodandarama temple, in Chingleput district.

As Rama temples began to be built in many parts of the country, new formulae (mantras), prayers (stotras), meditation (dhyana) etc., were required and many texts were composed from the eleventh-twelfth centuries. The three oldest are the Ramapurvatapaniya Upanishad, the Ramaraksastotra of Budhakausika, and the Agastya Samhita, a twelfth century text dealing with Shiva’s conversion to Rama bhakti. It stated that Rama was not just as an incarnation of Vishnu, but the Supreme Reality itself.

Rama’s popularity rose during the political tumult of the medieval period. In the thirteenth century, Hemadri, a minister in the Yadava kingdom of Devagiri, wrote a dharmanibandha (law code) giving liturgical instructions for worshipping Rama as an incarnation. He described a ceremony connected with Rama’s birth and reproduced a part of the Agastya Samhita, the first work to discuss the important festival of Rama Navami. During the twelfth and fifteenth centuries, Rama’s story was retold in Kannada, Telugu, Malayalam, Gujarati, Bengali, Oriya and Marathi.

The Muslim invasions led to a “power-packed naming of the man-god Rama” in the Tamil region. The intelligentsia evoked the concept of Kodanda-Rama, Rama with the bow, when they “saw their countrymen and fellowmen and their culture being shattered and mangled” by the invaders. Aditya Chola had a temple consecrated to Kodanda-Ramesvarama, perhaps the earliest such portrayal of Rama, and took the title of Kodandarama, a hint at the “political instrumentation of the Ramayana”.

Indeed, throughout the medieval era, Hindu kings on the path of Muslim armies styled themselves Rama incarnates, who had returned to complete his struggle against evil forces.  The Chalukya/Solanki king, Jayasimha Siddharaja of Gujarat was identified as an incarnation of Ramachandra, as was Prithviraja III of Ajmer, ramavatarasyaiva Prthvirajasya, who vowed to exterminate demon-men, ‘nararksasam’ mlecchanam.

Hindu rulers pledged to save the holy places of North India from devastation and plunder by Muslim invaders. There exist to this day a large number of vandalized sites where Hindus still perform puja on specially sanctified occasions. William Finch, an English traveller who visited India between A.D. 1608 and 1611, some eighty years after Babar, noted Hindu devotion to the city of Rama’s birth. He observed Brahmins in the ruins of Rama’s castle, who recorded the names of those who ritually bathed in the Saryu. Austrian Jesuit, Joseph Tieffenthaler, toured Awadh between 1766 and 1771 and noted Hindus worshiping a religious structure in the form of a vedi (cradle) inside the temple, along with large gatherings of Hindus on the occasion of Rama Navami.

The Allahabad High Court looked into the vedi (Rama Chabutra) and Sita ki Rasoi structures within the premises of Babri Masjid. Clearly, they were built at a time when the Masjid was largely desolate, and represent the heroic efforts of Hindus to reclaim a bit of the demolished temple and worship Rama in His birthplace.

Interestingly, revenue records of the Nawabi and British periods and list waqf properties published in the U.P. Gazette of 26 February 1944, show that Emperor Babur did not create any waqf for upkeep of the Babri Masjid. Possibly, he did not stay in the area long enough, but this lacuna is the basis of the controversy among Sunnis and Shias regarding the denominational status of the mosque. In Islam, every mosque must have a denominational status – Sunni, Shia, Ahmadi, and so on.

Further, Hindu legal and sacred texts are emphatic that temple property cannot be lost under any circumstances. Katyayana states that temple property is never lost, even if enjoyed by strangers for hundreds of years. On this basis, in the 19th century, the British courts in India established the concept of a Hindu idol/deity as a juridical entity. The Supreme Court of India upheld this in Ram Jankijee Deities vs. State of Bihar, observing, “Hindu Law recognizes a Hindu idol as a juridical subject being capable in law of holding property by reason of the Hindu Shastras following the status of a legal person in the same way as that of a natural person. It is not a particular image which is a juridical person but it is a particular bent of mind which consecrates the image …”

In the Allahabad High Court, counsels for the Muslim parties accepted that a Hindu idol is a legal person, but objected to the concept of juristic personality being extended to a place, Sthan. But the Allahabad High Court held that the divinity of a place made it a Swayambhu deity, capable of worship. A place, if identified by a name given to the deity by its worshippers and if shown to be related to a divine or otherwise important phenomena associated with religious affairs, could be regarded as a ‘deity,’ and a ‘juridical person.’ Hindus who worshipped the ‘Asthan Sri Rama Janam Bhumi, Ayodhya,’ identified the place by the name of Sri Rama’s birthplace.

Records of litigation between the Mutawalli Babri Masjid and Mahants of Janma Asthan from 1858 onwards, show that the Muslim presence there was hotly contested and not continuous; there does not seem to have been any namaz at the site after the riots of 1934. This could explain why the Sunni Central Waqf Board did not file a suit for possession, but asked for a declaration on the status of the disputed premises.  The Board joined the litigation only 18 December1961, just five days before the twelfth anniversary of the arrival of the murti of Ram Lalla under the central dome of the Masjid, 23 December 1949, on which date any claim would be time-barred.

The belated move to contest a possession that could have been graciously allowed to the Hindu community must have been a political decision, though we do not know the actors behind that move. The obduracy of those who have challenged Hindu claims to the site ever since the Lucknow Bench of the Allahabad High Court began day-to-day hearings leading to the majority verdict in favour of the Hindu community in September 2010, is clearly political and ideological. Their anger has intensified as growing voices within the Muslim community favour a graceful exit in favour of the Hindu community, and given their reach within all institutions of power, we would do well to remain on guard.

  • Based on Rama & Ayodhya, Meenakshi Jain, Aryan Books International, 2013.

Panchjanya, 26 November 2018

http://www.panchjanya.com/Encyc/2018/11/26/Leftists-always-did-the-job-of-refuting-Shriram-s-existence.html 

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